मकर संक्रान्ति पर जो स्नान-दान नही करते वे सात जन्मों तक रोगी और दरिद्र होते है:श्री-श्री शैलेशगुरुजी

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एकमा। सारण युवा सन्त व आध्यात्मिकगुरु और ओम ध्यान योग आध्यात्मिक साधना सत्संग सेवाश्रम के संस्थापक श्रीश्रीशैलेशगुरुजी ने सूर्य उत्तरायण के पर्व मकर संक्रान्ति के महत्व पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि मकर संक्रान्ति दक्षिणायन से उत्तरायण का परिवर्तन काल है. मकर संक्रान्ति दो अयन दो ऋतुओं दो राशियों का संधिकाल और संक्रमण का पर्व है. मकर संक्रान्ति पर स्नान – दान का विशेष महत्व हैं अतः स्नान के महत्व पर किसी भोजपुरी अवधीलोककवि ने ठीक ही लिखा है जो कहावत प्रचलित है.

“हमरे बुआ के तीन

नहान,खिचड़ी, फगुवा और सतुवान”

मतलब की हमारे बुआ के पूरे साल में तीन स्नान बस या विशेष होते है.एक तो खिचड़ी (मकर संक्रान्ति) , दूसरा होली और तीसरा मेष संक्रान्ति जिस दिन सतुआ का दान-खान होता है जिसे सतुवान कहते है.इससे स्पष्ट होता हैं कि इन तीनों पर्वो पर स्नान परमावश्यक माना गया है.श्री-श्रीशैलेशगुरुजी ने कहा कि महापर्व मकर संक्रांति पर स्नान महत्वपूर्ण होने से ही गोस्वामी बाबा तुलसीदास जी ने भी श्री रामचरितमानस मे यह उल्लेख किया है कि’माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथ पतिहिं आव सब कोई। देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी।।उत्तरायण सूर्य से देवताओं का प्रभात काल प्रारम्भ हो जाता है .वही एक माह व्यापी खरमास समाप्त हो कर विवाहादि मांगलिक व शुभ कार्यो का आयोजन भी प्रारम्भ हो जाता है. जनश्रुति की माने तो प्रयाग के कुम्भ में स्नान-दान करने का जो पुण्य फल प्राप्त होता हैं वही पुण्य मकर संक्रांति के दिन स्नान-दान करने से प्राप्त होता है.मकर संक्रांति स्नान-दान का विशेष महापर्व है जो इस दिन स्नान – दान नही करते वे सात जन्मों तक रोगी और दरिद्र (भाग्यहीन) होते है. ऐसा माना जाता है. इस विशेष मुहूर्त पर स्नान के पश्चात किये गए पूजन अर्घ्य और दान का सौ गुणा होकर पुण्य फल प्राप्त होता हैं.तीर्थराज प्रयाग में पुण्य काल मे स्नान का विशेष दिव्य महत्व है। अतः संक्रान्ति पर्व के पुण्यकाल मे ही स्नान-दान करें .श्रीश्रीशैलेशगुरुजी ने बताया कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण के अनुसार मकर संक्रांति के दिन कर्मकाण्डी विप्रो, दरिद्रों को वस्त्र दान से विशेष पुण्य फल तथा तिल सहित वृष दान से रोगों से मुक्ति मिलती हैं.शिवरहस्यानुसार मकर संक्रांति को कृष्ण तिल युक्त जल से स्नान कर उद्वर्तन तथा कन्याओं , विप्रो एवं दरिद्रों के लिए तिल का दान करें साथ ही तिल तेल से शिव मंदिर में दीप दान कर जलावें इससे शुभफल की प्राप्ति होती हैं.मकर संक्रांति पुण्यकाल में काशी खण्ड में दशाश्वमेघ घाट ,तीर्थराजप्रयाग, पुष्कर, हरिद्वार एवं विशेष कर गंगासागर में स्नान मात्र से समस्त पापों का क्षय (शमन) हो एक हजार अश्वमेघयज्ञ के पुण्य फल की प्राप्ति होती हैं. वही सभी पवित्र नदियों और सरोवरों में भी स्नान का बड़ा महत्व हैं. वही स्कन्दपुराण के अनुसार मकरसंक्रांति के पुण्यकाल पर तीर्थ स्थान में कम्बल, गौ,गुड़ एवं तिल दान के साथ अग्निप्रज्वलित कर यज्ञ – हवन, साधना, मंत्रोच्चारण, जाप , भूमि पर शयन और तीर्थ स्नान करने से श्रीहरिविष्णु , भुवन भास्कर सूर्यदेव और शनिदेव प्रसन्न होते हैं और समस्त कार्यो की सिद्धि तथा परम सुख की प्राप्ति होती है. वही श्रीश्रीगुरुजी ने बताया कि ज्योतिष की दृष्टि से अपने राशिग्रहानुसार वनस्पतीय जड़ी-बूटियों के स्नान से ग्रहों की शान्ति की जाती हैं जो लोग अपने कुण्डली के अनुसार शनि की वक्री दृष्टि, शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि के अशुभ गोचर में हैं और प्रभावित है तो मकर संक्रान्ति पर शनि से सम्बंधित दान कम्बल, कृष्ण तिल, सामुद्रिक नामक, काला नमक, तेल, काजल, सुरमा, चिमटा,लोहा, जूता, नील- कृष्ण वस्त्र, कोयला,नारियल, दीप दान, छाया दान आदि मकर संक्रान्ति के दिन प्रशस्त है. इससे शनि ग्रह की शान्ति हो कल्याण करते हैं.काशी से प्रकाशित पञ्चाङ्ग के अनुसार मकर संक्रान्ति के पर्व निर्णय और पर्वपुण्यकाल 15 जनवरी बुधवार को सूर्योदय से सूर्यास्त पर्यन्त रहेगा. अतः मकर संक्रान्ति का प्रसिद्ध पर्व खिचड़ी इसी दिन मनाया जायेगा.

इनपुट:चन्द्रप्रकाश राज/के.के.सिंह सेंगर/वीरेंद्र कुमार यादव

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