खत्म तरावीह के मौके पर सजाई गई महफिलें मिलाद की बज्मे

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सीवान: महाराजगंज शहर के नखासचौक स्थित छोटी मस्जिद व पुरानी बाजार स्थित शाही जामा मस्जिद में चांद रात से चल रही तरावीह की नमाज 15 रमजान उल मुबारक मंगलवार की रात को मुकम्मल हो गई. खत्म तरावीह के मौके पर मस्जिद को काफी सुन्दर सजाया गया था.वही खत्म तरावीह के मौके पर सजाई गई महफिले मिलाद में शायरों ने नबी की शान में नाते नजराने अकीदत पेश की. इस अवसर पर अकीदतमंदों को हाफिज जुल्फिकार हसन व मौलाना जहांगीर हसन मिस्वाई ने तरावीह की खास नमाज पढ़ाई.वही शाही जामा मस्जिद मे हाफिज डाँ.मोहम्मद फारुक साहब ने तरावीह कि नमाज पढ़ाई. जहां काफी संख्या में मुसलमानों ने नमाज तरावीह अदा कर अल्लाह की बारगाह में विशेष दुआएं मांगी गई. नमाज के बाद हाफिजे कुरआन व नमाजियों ने खुदा की बारगाह में गुनाहों की माफी मांगी.तरावीह के बाद शायरों ने नबी की शान में नाते नबी का नजराने अकीदत पेश की.

एक से बढ़कर एक नाते रसूल और मनकबतसुनाकर लोगों को जहां इस्लामी रंग में रंगने का काम किया, वहीं मौजूद अकीदतमंद नारे तकबीर और नारे रिशालत की सदायें बुलंद कर उनकी हौसला अफजाई करते रहे. इमाम मौलाना जहांगीर हसन मिस्वाई ने कहा कि इस्लाम अल्लाह का सबसे पसंदीदा दीन है और हजरत मोहम्मद साहब पूरी दुनिया के लिए रहमत बनकर आए. इसलिए जहां तक हो सके लोग नेक अमल करके अपनी जिदगी को कामयाब बनाएं. नाते नबी के बाद दुनिया में अमन व शांति के लिए दुआ की गई.वही मौलाना जहांगीर हसन मिस्वाई ने बताया कि इस साल फितरे की रकम 40 रुपये एक व्यक्ति पर है. आप सभी लोग अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चलें.यह माह बरकत का महीना है. इस माह मे सिर्फ नेकी ही नेकी करें.इधर शाही जामा मस्जिद के इमाम मौलाना इसरारुल हक ने कहा कि जकात इस्लाम के पांच अरकानों में से एक रुकन है. जकात का शाब्दिक अर्थ होता है किसी भी चीज को गंदगी से पाक करना. जकात को जकात इसलिए कहा जाता है कि वह इंसान के माल को पाक कर देता है और जिस माल में से जकात ढाई प्रतिशत अदा नहीं किया जाता है वह माल नापाक है. अल्लाह तआला ने कुरआन शरीफ में लगभग 82 जगह नमाज के साथ जकात के भी हुक्म दिए हैं. जकात हर ऐसे मुसलमान पर फर्ज है जिसके पास जरुरयाते जिदगी के अलावा साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या इनमें से किसी एक के बराबर नकद रुपये हो. जो मालदार मुसलमान जकात अदा नहीं करेगा कल कयामत के मैदान में उसी माल को जहन्नम की आग में गर्म करके दागा जाएगा. जकात के अदा करने से कभी माल कम नहीं होता है. जकात का माल गरीब, मिस्कीन, यतीम, विधवा और मजबूर लोगों को दिया जाता है. जकात सबसे पहले रिश्तेदार में अगर कोई गरीब, यतीम, विधवा हो तो पहले उन्हीं का हक होता है. उसके बाद गरीब पड़ोसी, उसके बाद दूसरे गरीब को देना चाहिए.इस अवसर पर मो.मुस्लिम, साहिद हुसैन,शमशाद खान,अकबर मियां,अफताब आलम,रेयाज अहमद, नौशाद अली, गुड्डू आलम,रौशन अली,लाडले, मो.आजाद,आदि दर्जनोंं रोजदार मौजूद थे.

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