महाराजगंज अन्नकूट महोत्सव आयोजित,गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाकर श्री कृष्ण ने तोड़ा था इंद्र का घमंड

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महाराजगंज शहर स्थित बाला बाबा पुरानी मठ के प्रांगण में किया गया अन्नकूट महोत्सव का आयोजन!!

सिवान: महाराजगंज शहर स्थित बाला बाबा पुरानी मठ के प्रांगण में गुरुवार की देर संध्या सैकड़ों महिलाएं पुरुषों ने एक साथ मिलकर गोवर्धन महोत्सव मनाया। साथ ही साथ भक्तों ने भगवान श्री कृष्ण को 56 तरह के पकवान अर्पित किया। गोवर्धन पूजा कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है। जिसे लोग अन्नकूट पूजा भी कहते है। वहीं ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गोवर्धन पूजा के नाम से भी जानते हैं। अन्नकूट पूजा दिवाली के एक दिन बाद यानी ठीक दिवाली के अगले दिन मनाई जाती है.अन्नकूट पूजा के पर्व पर अन्न का विशेष महत्व है।

इस पर्व पर कई तरह के खाने, मिठाई, पकवान यानी छप्पन भोग बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता है. दिवाली के ठीक दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है।क्योंकि गोवर्धन पूजा में अन्नकूट की सब्जी और पूरी का प्रसाद बना कर चढ़ाया जाता है। महाराजगंज शहर के बाला बाबा पुरानी मठ कार्यक्रम में मौजूद बाला बाबा मठाधीश बद्री नारायण दास, डॉ आशुतोष कुमार, भाजपा नेता प्रमोद कुमार सिंह, राजद नेता राज किशोर गुप्ता, सांसद प्रतिनिधि मोहन कुमार पद्माकर, सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुमार सिंह, जदयू नेता अजीत कुमार, अभिषेक ब्याहुत समेत हजारों की तादाद में लोग मौजूद रहे।

क्यों मनाया जाता है अन्नकूट महोत्सव

पौराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने लोगों को गोवर्धन पूजा करने को सलाह दिया था। कहा जाता है कि जब बालपन में श्रीकृष्ण छोटे थे तो श्रीकृष्ण की मां यशोदा भगवान इंद्र की पूजा कर रही थी। उस समय श्री कृष्ण ने अपनी मां से पूछा था कि वे इंद्र भगवान की पूजा क्यों कर रही है।कथाओं के अनुसार यशोदा ने श्री कृष्ण से कहा था कि सारे गांव वाले और वे भगवान इंद्र की पूजा इसलिए करते हैं।

ताकि उनके गांव में बारिश हो सके बारिश के चलते ही उनके गांव में अच्छे से फसलों की और घास की पैदावार हो सके और ऐसा होने से गायों को खाने के लिए चारा मिल सकेगा। वही अपनी मां की बात सुनकर कान्हा ने एकदम से कहा कि अगर ऐसी बात है तो हमें इंद्र भगवान की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि इस पर्वत पर जाकर ही हमारी गायों को खाने के लिए घास मिलती है। कृष्ण की इस बात का असर उसकी मां के साथ-साथ ब्रजवासियों पर भी पड़ा और ब्रजवासियों ने इंद्र देव की पूजा करने की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी शुरू कर दिया। पुरानी कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करते देख इंद्र देवता नाराज हो गए और उन्होंने क्रोध में काफी तेज बारिश करना शुरू कर दिया तेज बारिश के कारण गांव के लोगों को काफी परेशानी होने लगी और यह लोग कृष्ण भगवान के पास मदद मांगने चले गए वहीं लगातार तेज बारिश के कारण लोगों के घरों में भी पानी भरने लगा और उन्हें सिर छुपाने के लिए कोई भी जगह नहीं मिल सकी। अपने गांव के लोगों को रक्षा के लिए भगवान ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली से उठा लिया जिसके बाद ब्रजवासी इस पर्वत के नीचे जाकर खड़े हो गए भगवान ने इस पर्वत को एक सप्ताह तक उठाए रखा था। वही जब इंद्रदेव को पता चला कि कृष्ण भगवान विष्णु का रूप है। तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने बारिश को रोक दिया ।बारिश रुकने के बाद श्री कृष्ण ने पर्वत को नीचे रखा और उन्होंने अपने गांव के लोगों को हर साल गोवर्धन पूजा मनाने का आदेश दिया जिसके बाद से यह त्यौहार हर साल मनाया जाता है।

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